
अंतरराष्ट्रीय । जब अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को ड्रग तस्कर, हथियारों का सौदागर और आतंकियों का संरक्षक बताकर उनके सिर पर इनाम रखा, तब दुनिया ने इसे “आतंकवाद के खिलाफ सख्ती” कहा।
लेकिन वही दुनिया आज भी यह बताने से बचती है कि पाकिस्तान की सेना और उसका नेतृत्व आखिर किस अपराध के तहत आता है?
अगर मादुरो दोषी हैं,
तो रावलपिंडी का सैन्य मुख्यालय आतंकवाद की वैश्विक राजधानी क्यों नहीं माना जाए?
आतंक की प्रयोगशाला: पाकिस्तान
यह अब आरोप नहीं, दर्ज इतिहास है।
26/11 मुंबई हमला
पुलवामा आत्मघाती हमला
उरी और पठानकोट
कश्मीर में लगातार आतंकी घुसपैठ
इन सभी हमलों की जड़ें पाकिस्तान की धरती से जुड़ी हैं।
आतंकी संगठनों को न केवल संरक्षण मिला, बल्कि उन्हें “रणनीतिक संपत्ति” का दर्जा दिया गया।
👉 सवाल साफ है—
जो सेना आतंकियों को पालती है, क्या वह खुद आतंकी नहीं है?
अमेरिका का चयनात्मक न्याय
अमेरिका का आतंकवाद विरोधी सिद्धांत बड़ा सरल है—
कमजोर देश → प्रतिबंध, इनाम, गिरफ्तारी
रणनीतिक मोहरा → मौन, सहयोग, हथियार
पाकिस्तान ने दशकों तक
आतंक के बदले डॉलर लिए,
और बदले में “संयम” पाया।
मादुरो पर कार्रवाई साहस नहीं,
सुविधाजनक सख्ती है।
भारत का संयम: कमजोरी नहीं, चेतावनी
भारत ने शोर नहीं, प्रहार किया।
सर्जिकल स्ट्राइक
बालाकोट एयर स्ट्राइक
FATF में पाकिस्तान की घेराबंदी
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार सबूत
भारत ने बता दिया कि
अब आतंकवाद पर केवल फाइलें नहीं, फैसले होंगे।
लेकिन भारत ने यह भी साफ रखा कि
वह अमेरिका की तरह सत्ता परिवर्तन की राजनीति नहीं करेगा।
पाक आर्मी चीफ: सबसे सुरक्षित अपराधी?
दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी नेटवर्क का संचालन
अगर किसी वर्दी में हो रहा है,
तो उस वर्दी को सम्मान नहीं, कटघरे में होना चाहिए।
👉 अगर मादुरो पर इनाम जायज़ है,
👉 तो पाकिस्तान के आर्मी चीफ पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई क्यों नहीं?
डर किस बात का है?
परमाणु हथियारों का?
या सच्चाई उजागर हो जाने का?
अब फैसला टालना भी फैसला है
आतंकवाद या तो अपराध है,
या फिर कूटनीतिक सौदेबाजी का औज़ार।
दुनिया को चुनना होगा।
भारत अब उस मोड़ पर है
जहाँ संयम नीति है,
लेकिन चुप्पी विकल्प नहीं।
अब सवाल यह नहीं कि पाकिस्तान दोषी है या नहीं—
सवाल यह है कि दुनिया कब सच बोलने का साहस करेगी?













